श्री सिद्धबली बाबा धाम, कोटद्वार — इतिहास, मान्यता और महत्व
श्री सिद्धबली बाबा धाम उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल ज़िले में, कोटद्वार के पास खोह नदी के तट पर लगभग 40 मीटर ऊँचे टीले पर स्थित हनुमान जी का सिद्धपीठ है। यहाँ हनुमान जी की पूजा पिंडी रूप में होती है, और मान्यता है कि इसी स्थान पर गुरु गोरखनाथ को हनुमान जी के दर्शन हुए थे — इसी कारण इस धाम का नाम “सिद्धबली” पड़ा।
| देवता | हनुमान जी (पिंडी रूप में पूजित) |
|---|---|
| स्थान | खोह नदी के तट पर, कोटद्वार, पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड 246149 |
| रेलवे स्टेशन से | लगभग 2 किमी |
| दर्शन समय | प्रातः 5:00 – दोपहर 2:00 तथा दोपहर 3:00 – रात्रि 8:00 |
| आरती | मंगला आरती प्रातः 5:00 • संध्या आरती सायं 6:30 |
| प्रमुख आयोजन | हनुमान जयंती (अप्रैल) • सिद्धबली मेला एवं अनुष्ठान (दिसंबर) |
| प्राचीनता | स्थानीय मान्यता के अनुसार लगभग 400 वर्ष (कोई अभिलेखीय प्रमाण उपलब्ध नहीं) |
नाम के पीछे की मान्यता
इस धाम के नाम से जुड़ी सबसे प्रचलित कथा गुरु गोरखनाथ से सम्बन्धित है। गोरक्ष पुराण के आधार पर कही जाने वाली इस कथा के अनुसार, गुरु गोरखनाथ अपने गुरु मत्स्येन्द्रनाथ को लेने के लिए निकले थे। मार्ग में हनुमान जी ने रूप बदलकर उनका रास्ता रोक लिया और दोनों के बीच लम्बा युद्ध हुआ, जिसमें कोई भी परास्त नहीं हुआ। अन्ततः हनुमान जी ने अपने वास्तविक स्वरूप में दर्शन दिए और वरदान माँगने को कहा। गुरु गोरखनाथ ने उनसे सदा इसी स्थान पर विराजमान रहने की प्रार्थना की।
मान्यता है कि गुरु गोरखनाथ को यहीं सिद्धि प्राप्त हुई और हनुमान जी के दर्शन भी यहीं हुए — इन्हीं दोनों कारणों से इस स्थान का नाम सिद्धबली पड़ा। एक अन्य प्रचलित मत के अनुसार गुरु गोरखनाथ ने अपने अनुयायियों सहित यहाँ दीर्घकाल तक तप किया, जिससे यह स्थान “सिद्ध” कहलाया।
मंदिर की स्थापना की कोई प्रामाणिक तिथि उपलब्ध नहीं है। स्थानीय मान्यता के अनुसार यह धाम लगभग 400 वर्ष प्राचीन माना जाता है, यद्यपि इसका कोई अभिलेखीय प्रमाण नहीं मिलता।
मंदिर की विशेषताएँ
मंदिर खोह नदी के तट पर लगभग 40 मीटर ऊँचे टीले पर स्थित है और शिवालिक की पहाड़ियों से घिरा हुआ है। गर्भगृह तक पहुँचने के लिए सीढ़ियाँ चढ़नी होती हैं। यहाँ हनुमान जी की पूजा मूर्ति रूप में नहीं, बल्कि पिंडी रूप में होती है — मंदिर में दो पिंडियाँ स्थापित हैं, जिनकी पूजा “सिद्ध” और “बलि” के रूप में की जाती है। कालान्तर में हनुमान जी की खड़ी प्रतिमा भी स्थापित की गई।
निर्माण उत्तर भारतीय शैली में स्थानीय पत्थर से हुआ है, जिसमें एक बड़ा शिखर और छोटे गुंबद सम्मिलित हैं। सम्पूर्ण परिसर सिंदूरी रंग में रँगा रहता है, क्योंकि हनुमान जी को सिंदूर विशेष प्रिय माना जाता है। परिसर में अन्य देवी-देवताओं के मंदिर भी हैं। यहाँ का प्रसाद परम्परागत रूप से गुड़ का होता है।
परंपराएँ और लोक-आस्था
कोटद्वार और आसपास के क्षेत्र में सिद्धबली बाबा को भूम्याल देवता अर्थात् क्षेत्र के रक्षक देवता के रूप में माना जाता है। परम्परा रही है कि नई फ़सल का पहला भाग सबसे पहले बाबा को अर्पित किया जाता है, और किसी भी शुभ कार्य से पूर्व यहाँ भेंट रखी जाती है।
मनोकामना पूर्ण होने पर श्रद्धालु यहाँ भंडारे का आयोजन करते हैं। मंगलवार और रविवार को दर्शनार्थियों की संख्या विशेष रूप से अधिक रहती है; इन दिनों अन्य राज्यों से भी श्रद्धालु पहुँचते हैं। विवाह के पश्चात नवविवाहित दम्पति आशीर्वाद लेने यहाँ आते हैं। पौड़ी गढ़वाल के अतिरिक्त अन्य ज़िलों तथा उत्तर प्रदेश से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु वर्ष भर यहाँ पहुँचते हैं।
प्रमुख आयोजन
हनुमान जयंती — अप्रैल माह में यह पर्व मंदिर का सबसे बड़ा उत्सव होता है, जब हज़ारों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं।
सिद्धबली मेला एवं वार्षिक अनुष्ठान — प्रतिवर्ष दिसंबर माह में आयोजित होता है, जिसमें रुद्राभिषेक, रुद्र पाठ और शोभायात्रा सम्मिलित होते हैं।
